Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 77, Verse 40
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 77, verse 40 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 77 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
निरर्गलोल्लसन्नादं सर्गलोपशमक्रमम् ।
सर्गलोपोल्लसच्छेषं सर्गलोपविवर्जितम् ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, उस समय निरर्गल नाद का उल्लास हो रहा था,
त्रिलोकी में सृष्टि का लोप हो जाने से क्रमशः उसमें शान्ति मालूम पड़ने लगी, वास्तव में सृष्टि के
लोप से परमात्मा का ही विलास होने लगा । यदि तत्त्वदृष्टि से देखें तो सारा जगत् उत्पत्ति एवं
विनाश से शून्य ही है