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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 77, Verse 41

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 77, verse 41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 77 · श्लोक 41

संस्कृत श्लोक

अनारतविपर्यासकारिमारुतनिर्वृतम् । बीजराशिरिवाजस्रं पूर्यमाणं पुनःपुनः ॥ ४१ ॥

हिन्दी अर्थ

अथवा सवा ही सृष्टि ग्रे और सृष्टिलोप से युक्त है, इस आशय से कहते हैं / भद्र, अथवा यह जगत्‌ निरन्तर परिवर्तनकारी वायु से निवृत है एवं निरन्तर बीजराशि के सदृश बार-बार पूरा हो जानेवाला है