Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 77, Verse 42
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 77, verse 42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 77 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
उल्मुकान्योन्यनिष्पेषवह्निचूर्णसुवर्णजैः ।
रजोभिर्विवृतैर्हेमकुट्टिमाकाशकोटरम् ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, अधिक क्या कहें, सारे जगत् में लुआठों के एक
दूसरे के साथ हुए आघातं से अग्निचूर्णं ओर सुवर्ण जनित फैली हुई अपार धूलियों से आकाश का
कोटर सुवर्ण कुटिटम-सा बन गया