Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 77, Verse 45
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 77, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 77 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
एकार्णवोऽथ ववृधे शनै शीघ्रं सरिच्छतैः ।
भुवने जलकल्लोलैः कोपो मूर्खाशये यथा ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामजी, तदनन्तर वह अकेला
महासमुद्र धीरे-धीरे शीघ्रगामी सैकड़ों नदियों के द्वारा जल कल्लोल से भुवन में ऐसे बढ़ने लगा,
जैसे मूर्ख के चित्त मेँ कोप