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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 78, Verse 22

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 78, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 78 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

त्रिजगद्ग्राससंतृप्तः प्रगायन्निव घर्घरैः । स्वैर्नृत्यन्निव चोग्राद्रिकटकैर्वीचिदोर्द्रुमैः ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

तीनों लोक के ग्रास से संतृप्त हुआ वह प्रलयकालीन महासागर घर्घर शब्दों से एक तरह का गीत गा रहा था ओर उग्र पर्वतरूपी कंकणों से अलंकृत तरंगरूपी भुजाओं से वह मानों नाच कर रहा था