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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 78, Verse 9

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 78, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 78 · श्लोक 9

संस्कृत श्लोक

काष्ठवत्प्रोह्यमाणोग्रसुरासुरजनोत्करः । शनैः क्रमोच्छूनतया लिहन्नादित्यमण्डलम् ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

उसमें उग्र सुर, असुर ओर मनुष्यों के समूह काठ के सदृश बह रहे थे। वह समुद्र धीरे-धीरे क्रमशः बढ़ता हुआ आदित्यमण्डल को एक तरह से चाटने लग गया