Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 79, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 79, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 79 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
जाग्रत्यपि तथैवायं वासनायाः परिक्षये ।
नैवातिवाहिको नैव लक्ष्यतेऽत्राधिभौतिकः ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
स्वप्न से उठने पर जाग्रतकाल में एकमात्र स्वाध्निक भौतिक पदार्थों का बाध होता है, लेकिन
तत्वज्ञान होने फर तो आधिभौतिक आदि तीनों शरीर का बाध होता है इतना विशेष है, इस
आशय से कहते हैं ।
जाग्रत्काल में भी, वासना का सर्वथा नाश हो जाने से न तो आतिवाहिक (सूक्ष्म) शरीर भासता
है और न आधिभौतिक शरीर ही दीखता है अर्थात् वासना न रहने से वे दोनों नहीं भासते