Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 80, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 80, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
इति ते सर्वं आयाता ब्रह्मलोकनिवासिनः ।
अदृश्यतामेव गता दीपाः क्षीणदशा इव ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
अब योगिगम्य अन्य प्राकृत प्रलयक्रम का वर्णन।
विधाता की कासना से कल्पित उनके लोक; देव, भुवन आदि समस्त प्रपंच का जो प्रारन्धक्षय
के अनन्तर क्षणभर में ही उत्पन्न हुए साक्षात्कार द्वारा बाध है तदूप वैज्ञानिक ग्रलयका, जो
स्वप्नबाध के सदश है, उसका मुक्त पुरुषों की द्रष्टि से नापश्य॑ स्वप्न नगर दुध्यमान इवाग्रयम्”
इत्यावि श्लोक द्वारा उपपत्तिपूर्वक पूर्व सर्गा में वर्णन हो चुका। अब बुद्ध पुरुषों की दृष्टि से, विधाता
की देह, उसके आरम्भक उपाधियों तथा उसके इन्द्रिय आदिक का अपने-अपने कारण में लय
द्वारा मायाशबल ब्रह्म में लयरूपी प्रलय का उपवर्णन करने के लिए उपक्रम करते हैं /
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, इस तरह आये हुए वे सभी ब्रह्मलोकनिवासी
अदृश्यरूपता को ऐसे प्राप्त हो गये, जैसे बत्ती से रहित दीप
सर्ग सन्दर्भ
उन्नासीवाँ सर्ग समाप्त अस्सीवाँ सर्ग पूर्व सर्ग में वैज्ञानिक तत्त्वदृष्टि से प्रलयक्रम का वर्णन हो चुका ।