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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 80, Verses 36–37

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 80, verses 36–37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 36,37

संस्कृत श्लोक

पातालमिव पानीयं सर्पो बिलमिव क्षणात् । पञ्चवायुरिवाकाशमविशत्तन्मुखं जवात् ॥ ३६ ॥ समुपेत्यापिबद्रुद्रः स मुहूर्तेन तत्पयः । कृष्णाङ्गोऽर्क इव ध्वान्तं सत्संपर्क इवागुणम् ॥ ३७ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे जल पाताल में, साँप बिल में और पंचपवन प्राणियों के मुखाकाश में प्रविष्ट होते है वैसे ही एक ही क्षण में बड़े वेग से आकर वह भगवान्‌ रुद्र के मुख में प्रविष्ट हो गया और महाकाल रुद्र भगवान्‌ ने भी उस सारे जल को सिर्फ एक मुहूर्त में ही ऐसे पी लिया, जैसे सूर्य भगवान्‌ अन्धकार को तथा सज्जनों का सम्पर्क दोषसमूह को