Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 80, Verse 42
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 80, verse 42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 80 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
पातालभूतलदिवां सशैलेन्द्रदिवौकसाम् ।
व्याप्तः पार्थिवभागेन पङ्कमात्रात्मनात्मभाक् ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
शैलेन्द्रं तथा देवताओं के सहित पाताल, भूतल तथा स्वर्गं बिलकुल भस्म हो जाने
के कारण यानी तीनों लोकों तथा उनके भीतर रहनेवाले सभी पदार्थों के भरमरूप बन जाने
के कारण पुनः जलक्लेदन द्वारा एकमात्र पंकरूप में परिणत हुए पार्थिवभाग से व्याप्त होकर
वह ब्रह्माण्डसदन का अधोभाग ऊर्ध्वभाग की अपेक्षा अवश्य कुछ समृद्धस्वरूप था