Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 81, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
अतिदीर्घा करालास्या नभो मातुमिवोद्यता ।
दीर्घजानुभुजभ्रान्त्या मातुकामेव दिङ्मुखम् ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
वह बहुत लम्बी थी, उसका मुख बड़ा ही भयानक था । वह ऐसी खडी थी, मानों अपनी लम्बी देह
से आकाश नापने को उद्यत हो या आकाश से अपनी समता कर रही हो । वह मानों अपनी दीर्घ
जानु ओर भुजाओं के भ्रमण से समस्त दिशाओं के मुख को ही नापने की इच्छा कर रही थी