Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 81, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
अन्त्रान्त्रतन्त्रीग्रशितशिरःकरखुरोत्करा ।
आमूलात्सूत्रवलिता कण्टकानामिव स्थली ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
नाड़ियों के समूहों तथा अँतड़ियों रूपी रस्सियों
से ग्रथित सिर से लेकर पैर तक सभी अंगों से युक्त वह ऐसे स्थित थी, जैसे मूल से लेकर
शाखाग्रर्यन्त सूतों से ग्रथित कण्टकं की निवासभूमि (खदिरादि लता)