Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, Verse 52
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 81, verse 52 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 52
संस्कृत श्लोक
संग्रामोन्मुक्तचक्राभद्वीपार्णववृताम्बरम् ।
हेलाविवलनावर्त प्रौढशैलधरातृणम् ॥ ५२ ॥
हिन्दी अर्थ
संगमभूमि में छोड़े गए चक्रों के भ्रमण के सदृश शोभ रहे द्वीपों एवं समुद्रों से सारा आकाशमण्डल
व्याप्त हो गया था, हेलासे (क्रीडा से) उत्पन्न भ्रमणों से यानी आवर्तं वायुओं से मानों पर्वत एवं
धरारूपी तृण वर्तुलाकार में जोर से उड़ाये जा रहे थे