Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, Verse 54
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 81, verse 54 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 54
संस्कृत श्लोक
जगत्पदार्थैर्व्यामिश्रैरमिश्रैर्मुकुरैर्यथा ।
व्याप्तमाभोगिभाकारैरङ्गैरङ्गभ्रमैस्तथा ॥ ५४ ॥
हिन्दी अर्थ
परस्पर संयोग और विभाग से प्रत्येक क्षण में कभी मिलित एवं कभी विभक्त हुए
जगत्पदार्थों से युक्त अंगों एवं अंगभ्रमणों के कारण, दर्पण के सदृश उसकी देह में उनका नृत्य
विशाल भांकारों से मानों मूर्तिमान् भय-जैसे व्याप्त था