Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 81, Verse 55
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 81, verse 55 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 81 · श्लोक 55
संस्कृत श्लोक
मेरुर्नृत्यति लोलोच्चकुलाचलबृहद्भुजः ।
भ्रमदभ्रपटोपेतनमत्तनुतूनूरुहः ॥ ५५ ॥
हिन्दी अर्थ
उती जगत के नृत्य का विभागशः वर्णन करते हैं /
कहीं मेरु पर्वत अपने चंचल कुलाचलरूपी बड़े-बड़े हाथों का संचालन कर नृत्य करता था,
इसके अभ्ररूपी वस्त्रों से युक्त (आच्छन्न) छोटे-छोटे कल्पवृक्ष रूप लोमों का घुमाव बड़ा ही
रमणीय लग रहा था