Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 83, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 83, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 83 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
चेतनं चेतनाधातोः किंचित्संस्पदनं विना ।
क्वचित्स्थातुं न शक्नोति वस्त्ववस्तुतया यथा ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे भ्रान्ति
से दिखाई दे रही शुक्ति आदि वस्तु अवस्तुभूत रजत आदि रूप के बिना किसी तरह टिक नहीं
सकती, वैसे ही चिन्मात्र परब्रह्म परमात्मा की चेतनता भी बिना किसी स्पन्दन के स्थित नहीं रह
सकती, क्योंकि भ्रान्ति के स्वभाव का विपर्यसिकत्व-नियम सर्वत्र समान है । कहने का तात्पर्य यह
है कि जैसी भ्रान्ति एक जगह होती है ठीक वैसी ही भ्रान्ति ओर जगह भी दीखती है, ऐसा नियम
नहीं है कि दूसरी जगह की भ्रान्ति का स्वरूप कोई दूसरा हो