Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 83, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 83, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 83 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
स्वभावाच्चेतनं तस्माद्रुद्रत्वेन तथा स्थितम् ।
हेमेव रूपकत्वेन संनिवेशविलासिना ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
इसीलिए जैसे सुवर्ण कटक,
केयूर आदि आकारों से सुशोभित होनेवाले अलंकाररूप से स्थित होता है वैसे ही सद्रूप चेतन ब्रह्म
ही अपने स्वभाव से रुद्ररूप धारण कर स्थित है