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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 83, Verse 17

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 83, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 83 · श्लोक 17

संस्कृत श्लोक

यः स्पन्दश्चिद्धनस्यास्य शिवस्यास्य स एव नः । स्ववासनावेशवशान्नृत्यमेव विराजते ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

जो इस चिद्घन का स्पन्द है वही इस भगवान्‌ शिव का स्पन्द है । वही हम लोगों के सामने अपनी वासनावश नृत्यरूप से विराजमान होता है