Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 84, Verse 37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 84, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 84 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
आदर्शेष्वथवा स्वप्ने सर्गः संकल्पनेऽस्तु वा ।
स आत्मन्यर्थकारित्वात्सत्य इत्येव मे मतिः ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
अज्ञानियें की ष्टि से जगद् में प्रतीत्यात्मक सत्यता जो है, उसे स्वप्न आदि के पदार्थों में भी
कह सकते हैं; क्योकि उनके अनुरूप अर्थक्रियाकारिता उनमें भी देखी जाती है, यों कहते हैं ।
भद्र, दर्पण में प्रतिबिम्बात्मक या स्वप्न में दृश्यमान या संकल्प मे कल्पित जो सृष्टि है,
वह भी तो अज्ञानियों की दृष्टि से सिद्ध प्रतीत्यात्मक सत्य हो सकती है, क्योकि वह अपने
अनुरूप अर्थक्रियाकारी है ही, फिर उसे सत्य ही मानना चाहिये, यह मेरा मत है