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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 84, Verses 38–39

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 84, verses 38–39 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 84 · श्लोक 38,39

संस्कृत श्लोक

मम नार्थाय स इति वक्षि चेत्तत्कथं भवेत् । देशान्तरगताः सर्वे भवन्त्यर्थाय संप्रति ॥ ३८ ॥ यथा देशान्तरग्रामस्तद्गतस्यार्थकृद्भवेत् । सर्वे तथैव तद्भावं गतस्यार्थविनिश्चयात् ॥ ३९ ॥

हिन्दी अर्थ

हे राघव, यदि आप यह कहें कि दर्पण के भीतर विद्यमान घट आदि मेरे लिए बाहर जलाहरण आदि करने में समर्थ नहीं है, अतः सत्य नहीं, तो इस पर मैं यह कहता हूँ, सुनिये | ठीक ही है, वह दर्पण में रहने वाली चीज बाहर आकर कैसे अर्थ-सम्पादन करेगी ? दूसरे स्थान में स्थित वस्तु दूसरे स्थान में कुछ अर्थ-सम्पादन नहीं करती, इसलिये क्या उसे असत्य समझ लेना चाहिए ? आपके जो घट आदि पदार्थ दूसरे प्रदेश में रक्खे हैं, वे क्या आपके घर में आकर कुछ अर्थ करने में समर्थ हैं ? ऐसे सब पदार्थों की इस समय जैसे देशान्तर में अर्थ- क्रियाकारिता प्रसिद्ध है, ठीक वैसे ही दर्पण, स्वप्न आदि में प्रतिबिम्ब आदि की भी अर्थक्रियाकारिता है । जैसे देशान्तर में स्थित गाँव उसमें गये हुए पुरुष के लिए अर्थक्रियाकारी होता है, वैसे ही स्वप्न आदि के द्रष्टा के रूप को प्राप्त हुए पुरुष के लिए स्वप्नादिक के समस्त भाव अर्थक्रियाकारी होते ही हैं, क्योकि यही अर्थ का निश्चय है