Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 84, Verse 41
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 84, verse 41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 84 · श्लोक 41
संस्कृत श्लोक
तस्माच्चिच्छक्तिकोशस्थाः सर्वाः सर्गपरम्पराः ।
सत्य आत्मेति तद्भावं गतस्यान्यस्य नाखिलाः ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
इसी प्रकार प्रकृत में भी योजना करनी चाहिए, यों उफसहार करते हैं /
श्रीरामभद्र, इसलिए चितिशक्ति के कोश में अवस्थित समस्त सृष्टियाँ स्वप्नादि द्रष्टारूपता
को प्राप्त हुए पुरुष के प्रति सत्य है और अन्य के प्रति सब असत्य है, क्योकि तद्गत सत्यता
का प्रयोजक अधिष्ठानभूत आत्मा है ही