Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 84, Verse 48
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 84, verse 48 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 84 · श्लोक 48
संस्कृत श्लोक
भ्रान्तित्वं केवलं सैव दृश्यश्रीर्यावदग्रगा ।
त्वं विद्धीमामपि भ्रान्तिं जगल्लक्ष्मीमवास्तवीम् ॥ ४८ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, भगवती काली
के अंगों में स्थित वह समस्त दुश्यश्री केवल भ्रान्तरूपा ही थी, अतः आप इस समय की जगत्
लक्ष्मी को भी असत्य भ्रान्तिरूप ही जानिये