Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 84, Verse 50
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 84, verse 50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 84 · श्लोक 50
संस्कृत श्लोक
अहमिति जगदिति नान्तभ्रान्तिरियं प्रकचतीव चितः ।
परमाकाशकृशाख्या शाम्यति निपुणं परिज्ञाता ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र,
चितिरूप आत्मा के अन्दर यह “अहम्” (मैं) और जगत् नाम की कोई वास्तविक वस्तु है ही
नहीं, किन्तु आकाश कृशता (अल्पता) के सदृश केवल भ्रान्ति ही चमकती है । आकाश में
कृशता या कालिमा नहीं है, वह केवल भ्रान्ति से वैसा दीखता है । इसलिए इस दृश्यश्री को
निपुणता से देखा जाय तो वह शान्त हो जाती है