Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 85, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 85, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 85 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
इति नृत्यति सा देवी दीर्घदोर्दण्डमण्डलैः ।
परिस्पन्दात्मकैर्व्योम कुर्वाणा घनकाननम् ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : भद्र, वर्णित रीति से भगवती कालरात्रि भयंकर नृत्य करती है, उसके
नृत्य का क्या हाल कहें, परिस्पन्दनात्मक अपने दीर्घ भुजमण्डलों से उसने सारे आकाश को एक
घना जंगल-सा बना रक्खा है
सर्ग सन्दर्भ
चौरासीवाँ सर्ग समाप्त पचासीवाँ सर्ग नृत्य कर रही काली का शिवजी का दर्शन ओर बड़े प्रेम से स्पर्श कर उनके अंग मेँ विलीन हो एकरूप हो जाना, यह वर्णन।