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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 85, Verse 2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 85, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 85 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

क्रियासौ नृत्यति तथा चितिशक्तिरनामया । अस्या विभूषणं शूर्पकुडालपटलादिकम् ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीरामजी, चितिशक्तिका असली तत्त्व न जानने पर वह क्रियारूप बन जाती है ओर वह स्वभाव से वहाँ नृत्य करती है । वास्तव स्थिति तो यह है कि चिति शक्ति में किसी तरह का नृत्यादि विकार है ही नहीं । इसी क्रियात्मक चिति के सूप, कुदाल, पटल आदि भूषण हैं