Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 84, Verse 9
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 84, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 84 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
वडवाग्निशिखाकाराच्छोष्याच्छुष्केति कथ्यते ।
चण्डित्वाच्चण्डिका प्रोक्ता सोत्पलोत्पलवर्णतः ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
्रीपिचर्मपरीधाना शुष्कमासातिभैरवा ˆ (व्याप्रचर्म धारण की हुई. शुष्कमांसा एवं अतिभयकर
देवी) इत्यादि पुराणों में उसकी जो शुष्कता प्रसिद्ध है. उसमे भी निमित्त बताते हैं
श्रीरामजी, वह शुष्का भी कही जाती है, क्योकि समुद्र आदि के जलों से आर्द्र ब्रह्माण्डरूप
शरीरधारिणी वह बड़वाग्नि की लपट के सदृश लपटधारी आदित्य आदि की ज्योतियों से सूख
जाती है । दुष्टों के लिए क्रोध की मूर्ति होने से चण्डिका तथा उसका कमल के सदृश वर्णवाली
होने से उत्पला कही जाती है