Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 86, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 86, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 86 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
दर्पणप्रतिबिम्बाभं शिलाशकलकोटरे ।
अथ तामङ्गनां स्मृत्वा तां शिलां तच्च विभ्रमम् ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
हे राघव, तदनन्तर उस अंगना का उस शिला का एवं
उस संसारभ्रम का स्मरण कर मैं ऐसे ही विस्मय को प्राप्त हुआ, जैसे कि ग्रामीण पुरुष, जिसने
कभी नगर न देखा हो, राजद्वार पर आकर परम विस्मय को प्राप्त होता है