Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 86, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 86, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 86 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
यावत्सर्वत्र सन्त्यत्र सर्गाः काल्या इवाङ्गके ।
बुद्धिनेत्रेण दृश्यन्ते दिव्याक्ष्णा वा न ते यथा ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, बुद्धिरूपी नेत्र से वे सृष्टियाँ उन
शिलाखण्डों में दीख पड़ती हैं, और अद्वैतदृष्टि से वे नहीं भी दीख पड़तीं, सब जगह सब काल में
सर्वात्मक वस्तु जब रहती है, तब वैसा हो ही सकता है