Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 86, Verse 24
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 86, verse 24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 86 · श्लोक 24
संस्कृत श्लोक
कल्प्यमानर्क्षचन्द्रार्कदिनरात्र्यृतुवत्सरम् ।
क्वचित्क्वचिन्महीपीठसंपन्नजनमण्डलम् ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
कहीं पर पृथ्वी की पीठ मनुष्यों
के समूहों से भरी थी, तो कहीं पर राजा सगर के पुत्रों ने चार समुद्ररूपी विकट खाइयाँ अभी तक
नहीं खोद पायी थीं