Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 86, Verse 33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 86, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 86 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
अपूर्ववेदशास्त्रार्थसमाचारविचारणम् ।
क्वचित्किंचिन्न कल्पान्तसंक्षोभमिव संस्थितम् ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
कहीं पर तो जगत् में दैत्यों के समूहों से देवताओं के घर लुटे हुए मिले, और
कहीं किसी जगत् में देवताओं के उद्याना में गन्धर्व तथा किन्नर मधुर गाना गा रहे थे