Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 86, Verse 37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 86, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 86 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
एकत्र सौम्यसकलभूतसंततिसंस्थितम् ।
एकत्र समनुक्षुब्धसुरासुरनरेश्वरम् ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
कहीं पर कुपित देवता, दावन एवं राजाओं
से व्याप्त था, कहींपर सूर्य की उत्पत्ति ही न होने के कारण निरन्तर अनाशित अन्धकार से
पूर्ण था