Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 86, Verse 38
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 86, verse 38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 86 · श्लोक 38
संस्कृत श्लोक
एकत्रासंभवद्भानुनित्याभिन्नतमोघनम् ।
एकत्रासंभवद्ध्वान्त कान्तं ज्वालोदरोपमम् ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
कोई सूर्योदय के कारण अन्धकार से रहित अतएव ज्वालोदर के समान सुन्दर
प्रतीत हो रहा था, और कहीं भगवान् के नाभिकमल की नाल में मधु ओर कैटभ छिपे हुए
थे