Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 86, Verse 41
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 86, verse 41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 86 · श्लोक 41
संस्कृत श्लोक
शिलाजठरनिस्पन्दं व्योमैव वितताकृति ।
सुषुप्तजठराकारमप्रज्ञातमलक्षणम् ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
कोई तो सोया हुआ ओर जठर के सदृश मालूम पड़ रहा था, कोई
अतर्कि त (विलक्षण) तथा ज्ञानयोग्य ही नहीं था, इसलिए चारों ओर रुषुप्त-सा प्रतीत हो
रहा था