Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 86, Verse 42
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 86, verse 42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 86 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
अप्रतर्क्यमविज्ञेयं सुषुप्तमिव सर्वतः ।
एकत्र पक्षविक्षुब्धशैलकाकाकुलाम्बरम् ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
किसी जगत् में पंखों से अत्यन्त क्षुब्ध पर्वतरूपी कौओं से सारा आकाशमण्डल
आच्छन्न था ओर किसी में तो वज्र से चूर्णित अतएव द्रवीभूत पर्वतो के कारण अपूर्वं भासुरता
दीख पडती थी