Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 86, Verse 44
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 86, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 86 · श्लोक 44
संस्कृत श्लोक
एकत्र पुरवृत्रान्धवलिसंगरसंकुलम् ।
एकत्र मत्तपातालगजकम्पिवसुन्धरम् ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
कहीं पर मत्त पातालगजों से वसुन्धरा
कम्पित हो रही थी ओर कहीं शेष के मस्तक से कल्पान्त में पृथ्वी लुढक रही थी