Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 86, Verse 46
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 86, verse 46 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 86 · श्लोक 46
संस्कृत श्लोक
रक्षसा रावणेनैव क्वचिद्विहतराघवम् ।
भूस्थपादेन देवाद्रिशिरस्थशिरसा परम् ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
कहीं पर कालनेमि राक्षस ने भूमि पर धरे
अपने पैर से तथा सुमेरु पर्वत के मस्तक पर रक्खे अपने मस्तक से महान् आकाश को आक्रान्त
कर रक्खा था, यह भी मुझे देखने मेँ आया