Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 87, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
ततः किंचिन्मनाङ्मात्रं झंकारं श्रुतत्रानहम् ।
प्रध्मातस्येव शङ्खस्य शब्दं व्योम्नः स्वभावजम् ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
तत्पश्चात मैंने वहाँ पर
कुछ थोड़ा-सा एक झंकार सुना । वह जोरसे पके गये शंख के शब्द-जैसा आकाश का स्वाभाविक
शब्द था