Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verse 28
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 87, verse 28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
याभ्यामहमथाश्रौषं त इमे श्रवणव्रणे ।
प्रदेशाभ्यां विचरता मरुता विततस्वनम् ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
मैंने जिन दो छिद्र प्रदेशों द्वारा संचरणशील वायु की सहायता से (70) बहुत दूर
तक फैले हुए शब्द का श्रवण किया वे दोनों कर्णच्छिद्र हुए