Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verse 63
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 87, verse 63 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 63
संस्कृत श्लोक
ह्रियमाणं महीपालः शोभमानेभतन्तुभिः ।
प्राणिभिर्भुज्यमानाङ्गं वर्धमानं व्यवस्थया ॥ ६३ ॥
हिन्दी अर्थ
सेनासमूहरूपी तन्तुओं की गाँठ-जैसे जिनके हाथी खूब सुशोभित हो रहे
थे, ऐसे अनेक राजे परस्पर युद्ध द्वारा भूपीठरूप मेरा हरण करने लगे, अनेक प्राणियों से मेरा अंग
उपभुक्त होने लगा और ग्राम, नगर तथा प्रदेश आदि की व्यवस्था से मैं खूब बढ़ने लग गया