Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verse 64
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 87, verse 64 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 64
संस्कृत श्लोक
हिमवद्विन्ध्यसुस्कन्धं सुमेरूदारकन्धरम् ।
गङ्गादिसरिदापूरमुक्ताहाररणत्तनुम् ॥ ६४ ॥
हिन्दी अर्थ
हिमालय तथा विन्ध्याचल मेरे सुन्दर कन्धे थे, सुमेरु पर्वत ऊँची गर्दन था, गंगा, यमुना आदि
नदियों के प्रवाहरूपी मुक्ताहारों से मेरा शरीर ब्रह्मञ्मकारयुक्त हो उठा