Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 87, Verse 65
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 87, verse 65 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 87 · श्लोक 65
संस्कृत श्लोक
गुहागहनकच्छादि सागरादर्शमण्डलम् ।
मरूषरस्थलश्वेतसुवराम्बरसुन्दरम् ॥ ६५ ॥
हिन्दी अर्थ
गुहाओं से गहन
कछार आदि देशों तथा आदर्श-मण्डल जैसे अनेक सागरो से मैं परिपूर्णं हो गया ओर मरूदेश तथा
ऊसर स्थलरूपी सफेद सुन्दर वस्त्रों से भासित होने लगा