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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 88, Verse 3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 88, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 88 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

क्वचिद्दुर्वारदुर्भिक्षदुराक्रन्दं दुरीहितम् । क्वचित्सकलसस्यौघसंपन्नघनसौहृदम् ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

कहीं पर दुर्निवार दुर्भिक्ष के कारण बीभत्स क्रन्दन हो रहा था, कहीं पर दुष्ट चेष्टाओं का जाल बिछा था, कहीं पर सुवृष्टि के कारण फले हुए धानों की सम्पत्ति से चारों ओर घन सौहार्द निखर रहा था