Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 89, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 89, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 89 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
सर्वं चिन्मात्रमाशान्त प्रकचत्यात्मनात्मनि ।
भूमण्डलात्म दृश्यात्म द्वैतैक्याभ्यां विवर्जितम् ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
किस तरह का ज्ञान हो जानेपर जगत् वेतनमात्ररूप बन जाता है इस पर कहते हैं /
सब कुछ चारों ओर से शान्त चिदाकाशमात्ररूप ही है, अपने आप ही आत्मा में वह स्फुरित होता
है, भूमण्डलरूप और दुश्यरूप चिति ही है, जो द्वैत एवं एकता से रहित है