Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 90, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 90, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 90 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
मुखेनाविश्य हृदयमृतुवैधुर्यधारिणा ।
हृता विधुरिता भुक्ता लूना देहेषु धातवः ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
जीवों की देहों मे जलपान के समय मुख के द्वारा हृदय में प्रवेश कर बसन्त
आदि ऋतुओं के कारण होनेवाली विषमता धर लेनेवाले मैंने कहीं वात, पित्त ओर कफरूप धातुओं
को धारण किया, कभी उन्हें कुपित किया, कुछ को जठराग्नि से पचा डाला, किन्हीं को खण्डित
किया