Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 90, Verse 19
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 90, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 90 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
धूमरूपेण निर्गत्य दारुभ्यो गगनार्णवे ।
कणरत्नेन नीलर्क्षमण्यन्तर्वर्तिना स्थितम् ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
लकड़ियों से धूम्र के रूपमें निकलकर मैं आकाशरूपी
समुद्र में नीले रंग के नक्षत्र मणियों के भीतर रत्नकण बना और मैंने वहाँ स्थान जमा लिया ।
श्रीवश्तिष्ठजी की इस उक्ति से यह मालूम होता है कि हम लोगों के लिए अदृश्य नीले वर्ण के भी
नक्षत्र आकाशमण्डल में हैं