Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 92, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 92, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 92 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अथ वातमयीं कृत्वा जगत्प्रेक्षणकौतुकात् ।
धारणां धीरया वृत्त्या विततामहमागतः ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : भद्र, तदनन्तर मैंने जगत् देखने की उत्कण्ठा से वायुमय धारणा
बोधी । फिर धीर वृत्ति से वायुरूप में स्थिति प्राप्त हो जाने तक की लम्बी वायुमय धारणा को प्राप्त
हुआ
सर्ग सन्दर्भ
इक्यानबेवाँ सर्ग समाप्त बानवेवों सर्ग वायु की धारणा से वायुभाव प्राप्त हो जाने पर वायु के कार्यो का विस्तार तथा आकाश के साथ सवत्मिभाव में स्थिति-यह वर्णन।