Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 92, Verse 21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 92, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 92 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
पुरोगतोऽप्यदृश्यात्मा मनोराज्यपुरोपमः ।
तालवृन्ततिलेतैलमालानं स्पन्ददन्तिनः ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र,
मैं सामने रहता था फिर भी मेरे स्वरूप को कोई देख नहीं पाता था, अतएव मैं मनोराज्य से कल्पित
नगर के सदृश था । पंखेरूपी तिलों में मैं तेल के सदृश तथा स्पन्दनरूप हाथी के लिए मैं
बन्धनस्तम्भ आलानरूप था