Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 92, Verses 45–46
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 92, verses 45–46 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 92 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
मत्प्रसादेन मुदितैर्लब्धमर्कादिभिर्वपुः ।
कृष्णरक्तसितापीतहरितैर्हरितैरिव ॥ ४५ ॥
समुद्रमुद्रया सप्तद्वीपसप्तात्मरूपया ।
संस्थया स्थापिता भूमिः प्रकोष्ठे वलयोपमा ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
तब क्या मक्खी, जूँ आदि के स्वथ भयभीत एवं प्रतिक्षण हटाये जाने के कारण उब्विग्न होकर
उन्होंने ब्रह्माण्डथूत आपकी देह में निवास किया 2 इस प्रश्न का नकारात्मक उत्तर देते हैं
हे राघव, मेरी कृपा से प्रसन्न होकर सूर्य आदि देवताओं ने शरीर से कृष्ण, रक्त, श्वेत,
अश्वेत, पीत, हरित, वर्णों से स्निग्ध होकर वृक्षों के सदृश मेरे शरीर में स्थिति प्राप्त की