Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 92, Verse 47
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 92, verse 47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 92 · श्लोक 47
संस्कृत श्लोक
विद्याधरपुरन्ध्रीणां परामृष्टाङ्गयष्टिना ।
अदृष्टेनैव विहितः पुलकोल्लास आत्मना ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, ब्रह्माण्डरूप होकर मैंने सात समुद्रों से वेष्टित तथा सात द्वीपों के कारण सात रूप धरनेवाली
यानी सात अंगों से युक्त भूमिको अपनी कलाई में कंकण के सदुश धारण कर लिया था ॥४ ६॥ मैंने
विद्याधरों की रमणियों की अंगरूपी यष्टियों की स्पर्शकर उनमें अपने अमन्द आनन्द से पुलकावलियाँ
उत्पन्न कर दीं । मैंने यद्यपि उनमें पुलकावलियाँ उत्पन्न कर दी थीं, तथापि वे मुझको देख नहीं
पाती थीं