Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 92, Verse 48
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 92, verse 48 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 92 · श्लोक 48
संस्कृत श्लोक
सरिच्छिरामलस्फाररसानि सुषिराणि च ।
जगन्त्येवास्थिजालानि ममासन्संस्थितानि च ॥ ४८ ॥
हिन्दी अर्थ
राघव, नदीरूप नाड़ियों से निर्मल (शुद्ध) भीतर स्थित प्रचुर रससे पूर्ण, नाना
छिद्रों से युक्त पर्वत आदि जगत् मेरे शरीर में अस्थिपंजर तथा मांस आदि बन गये थे